Tuesday, August 18, 2020

मैं और सूरज

मुझमें और सूरज में फर्क हीं क्या हैं 
वो जैसे हजारो किरणों के साथ आता हैं ,
मैं भी सुबह हजारों उम्मीदों के साथ जागती हूँ
उसकी किरणें फ़ैल जाती है
उजाला बनके हर तरफ 
मैं भी रोशनी ख़ुशीे की भरने
बिखर जाती हूँ कोने-कोने में
थक के चूर हो जाती है किरणें शाम होने तक
उसका चेहरा भी उतर जाता है मेरी तरह
वो भी फिर मेरी तरह डूब जाता है
नींद में रात भर के लिए ,
लेकिन ..
अगली सुबह फिर वो जागता है और चल पड़ता है
नयी उम्मीदों की किरणों को साथ लिए
कुछ मेरी ही तरह .....

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