कोई इस कदर मुझको
यूँ आँखों से चाहे
दिल में उतरकर वो मेरी
रूह को छू जाए।
वो जब भी मुझे देख
यूँ मंद-मंद मुसकाए,
बिन-बोले बिन-सुने ही वो
मेरा हमराज़ बन जाए।
वो आए ना पास मेरे ना
कभी अंग लगाए,
बिन छूहे ही वो मन
मेरा यूँ सावन कर जाए।
आँखों में मेरी वो ऐसे
रच-बस जाए
जहाँ भी मैं देखूँ छवि
उसकी ही नज़र आए ।
काश! हो जाए कुछ ऐसा
दिल दिल से मिल जाए
बिन थामे ही हाथ मेरा
वो हमसफ़र बन जाए।
Kafi badhiya
ReplyDeletevery nice
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